सुप्रीम कोर्ट सुनवाई में चयन पक्षपात पर चिंता

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नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर गुरुवार को केंद्र सरकार से तीखे सवाल किए। अदालत ने कहा कि मौजूदा व्यवस्था में सरकार अपनी पसंद के व्यक्ति की नियुक्ति कर सकती है, जिससे चयन प्रक्रिया की स्वतंत्रता पर सवाल खड़े होते हैं। कोर्ट ने यह भी पूछा कि जब चयन समिति में सरकार के पक्ष में बहुमत पहले से तय है, तो स्वतंत्रता का दिखावा क्यों किया जा रहा है। जस्टिस दीपांकर गुप्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि वर्तमान चयन समिति में प्रधानमंत्री, एक केंद्रीय मंत्री और लोकसभा में विपक्ष के नेता शामिल होते हैं। ऐसे में तीन सदस्यीय समिति में दो सदस्य सरकार के पक्ष में होते हैं, जिससे निर्णय का संतुलन प्रभावित होता है। पीठ ने कहा कि यदि समिति में कोई स्वतंत्र सदस्य नहीं होगा तो विपक्ष के नेता की भूमिका महज औपचारिक बनकर रह जाएगी। अदालत ने सुझाव दिया कि केंद्रीय मंत्री के स्थान पर किसी स्वतंत्र व्यक्ति को समिति में शामिल किया जाना चाहिए, ताकि चयन प्रक्रिया अधिक निष्पक्ष और पारदर्शी दिखाई दे। सुप्रीम कोर्ट ने अपने पूर्व आदेश का हवाला देते हुए कहा कि पहले निर्देश दिया गया था कि नियुक्ति समिति में प्रधानमंत्री, भारत के मुख्य न्यायाधीश और विपक्ष के नेता को शामिल किया जाए। हालांकि अदालत ने स्पष्ट किया कि यह जरूरी नहीं कि मुख्य न्यायाधीश ही समिति का हिस्सा हों, लेकिन किसी स्वतंत्र सदस्य की मौजूदगी अनिवार्य होनी चाहिए। पीठ ने सीबीआई निदेशक की नियुक्ति प्रक्रिया का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां प्रधानमंत्री, मुख्य न्यायाधीश और विपक्ष के नेता वाली स्वतंत्र समिति नियुक्ति करती है। जब ऐसा सीबीआई निदेशक के लिए संभव है तो चुनाव आयोग जैसे अधिक महत्वपूर्ण संवैधानिक संस्थान के लिए ऐसा क्यों नहीं हो सकता।

अदालत ने कहा कि चुनाव आयोग देश में लोकतंत्र को बनाए रखने और स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने वाली संस्था है। इसलिए इसकी नियुक्ति प्रक्रिया न केवल निष्पक्ष होनी चाहिए बल्कि निष्पक्ष दिखनी भी चाहिए। सुनवाई के दौरान अटॉर्नी जनरल के. वेंकटरमणी ने दलील दी कि मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की निष्पक्षता उनकी नियुक्ति के बाद उनके कार्य करने के तरीके से तय होती है। लेकिन अदालत ने इस तर्क से असहमति जताते हुए कहा कि निष्पक्षता की शुरुआत नियुक्ति प्रक्रिया से ही होती है। पीठ ने दो चुनाव आयुक्तों की हालिया नियुक्तियों पर भी सवाल उठाए और कहा कि यह प्रक्रिया जल्दबाजी में पूरी की गई प्रतीत होती है। अदालत ने केंद्र सरकार से इस संबंध में मूल रिकॉर्ड पेश करने का निर्देश दिया है। सुनवाई के दौरान पीठ ने चयन समिति की संरचना पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि प्रधानमंत्री अपने भरोसेमंद मंत्रियों में से किसी एक को समिति में शामिल करते हैं तो विपक्ष के नेता की भूमिका स्वतः कमजोर हो जाती है और फैसला हमेशा 2ः1 के अनुपात में सरकार के पक्ष में जा सकता है। यह मामला उस कानून की वैधता से जुड़ा है जिसे सुप्रीम कोर्ट के पूर्व आदेश के बाद संसद ने पारित किया था। इसी कानून के तहत वर्ष 2024 में ज्ञानेश कुमार और एसएस संधू की नियुक्ति की गई थी। ज्ञानेश कुमार वर्तमान में मुख्य चुनाव आयुक्त हैं। सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया कि वह यह नहीं कह रहा कि समिति में मुख्य न्यायाधीश को ही रखा जाए, लेकिन इतना जरूर आवश्यक है कि चयन समिति में कोई स्वतंत्र सदस्य हो ताकि चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था की स्वायत्तता और विश्वसनीयता पर जनता का भरोसा बना रहे।