कैंपस की सीमाओं से बाहर सामाजिक जिम्मेदारी निभाएंगे उत्तराखंड के विश्वविद्यालय

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उत्तराखंड में उच्च शिक्षा को केवल किताबी ज्ञान और डिग्री बांटने तक सीमित रखने के बजाय उसे धरातल पर शोध, नवाचार और सीधे रोजगार से जोड़ने के लिए एक ऐतिहासिक पहल की शुरुआत होने जा रही है। अब राज्य के तमाम राजकीय और निजी विश्वविद्यालय अपनी दीवारों से बाहर निकलकर समाज के विकास में सीधे भागीदार बनेंगे।

विधानसभा स्थित सभागार में आयोजित उच्च स्तरीय बैठक में यह तय किया गया है कि प्रदेश का प्रत्येक विश्वविद्यालय सामाजिक दायित्व (CSR) निभाते हुए पांच-पांच गांवों को गोद लेगा। इसके साथ ही 'विकसित भारत-2047' के विजन को धरातल पर उतारने के लिए शिक्षा की गुणवत्ता और आपसी समन्वय का एक नया रोडमैप तैयार किया गया है। बैठक में राज्य के उच्च शिक्षा तंत्र को अधिक प्रभावी और समन्वित बनाने पर विस्तार से चर्चा हुई। अब तक सरकारी और निजी विश्वविद्यालय अलग-अलग दिशाओं में काम करते थे, जिससे संसाधनों का दोहराव होता था। अब नई नीति के तहत दोनों ही पक्ष शोध परियोजनाओं, नवाचार और अकादमिक गतिविधियों में एक-दूसरे के साथ मिलकर काम करेंगे। इस साझा समन्वय से न केवल संसाधनों का बेहतर और अधिकतम उपयोग सुनिश्चित होगा, बल्कि उत्तराखंड से होने वाले शोध कार्यों की गुणवत्ता में भी वैश्विक स्तर पर सुधार आएगा। इसका सीधा लाभ प्रदेश के युवाओं और शोधार्थियों को मिलेगा, जिन्हें अब काम करने के लिए व्यापक और बेहतर अवसर उपलब्ध होंगे। देश के दीर्घकालिक लक्ष्यों से युवाओं को जोड़ने के लिए 'विकसित भारत-2047' की थीम को उच्च शिक्षा का मुख्य केंद्र बिंदु बनाया गया है। इसके तहत प्रत्येक विश्वविद्यालय को साल में विभिन्न ज्वलंत विषयों पर दो-दो राष्ट्रीय या अंतर्राष्ट्रीय सेमिनार आयोजित करने होंगे। इन आयोजनों की खासियत यह होगी कि इसमें देश-दुनिया के नीति निर्धारक, शिक्षाविद, विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञ और पद्म सम्मान से नवाजे जा चुके प्रतिष्ठित व्यक्तित्व शिरकत करेंगे। छात्र-छात्राओं को सीधे इन दिग्गजों से संवाद करने का मौका मिलेगा, जिससे वे देश के नीतिगत बदलावों और नवाचार के प्रति जागरूक हो सकेंगे। विश्वविद्यालयों का समाज से सीधा जुड़ाव सुनिश्चित करने के लिए सामाजिक उत्तरदायित्व को अनिवार्य किया गया है। हर यूनिवर्सिटी अपने आसपास के 5 गांवों को गोद लेकर उन्हें आदर्श गांव के रूप में विकसित करेगी। इन गांवों में विश्वविद्यालय के छात्र और फैकल्टी स्वच्छता अभियान, नशा मुक्ति कार्यक्रम, स्वास्थ्य और शिक्षा को लेकर जनजागरूकता अभियान चलाएंगे। इसके अलावा, प्रत्येक विश्वविद्यालय को अनिवार्य रूप से एक आंगनबाड़ी केंद्र या एक राजकीय प्राथमिक विद्यालय को गोद लेना होगा। वहां बच्चों के लिए आधुनिक और मूलभूत सुविधाएं (जैसे- इंफ्रास्ट्रक्चर, किताबें, खेलकूद का सामान) उपलब्ध कराने में विश्वविद्यालय सहयोग करेंगे। बैठक में राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के प्रावधानों के तहत पाठ्यक्रमों को अपग्रेड करने पर सहमति बनी। अब स्थानीय भाषा, उत्तराखंड की समृद्ध लोक संस्कृति, परंपराओं और धरोहरों को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया जाएगा। साथ ही, युवाओं को स्वरोजगार के लिए तैयार करने वाले स्किल-बेस्ड कोर्सेज को बढ़ावा दिया जाएगा। छात्रों के सर्वांगीण विकास के लिए निजी विश्वविद्यालयों में राज्य स्तरीय खेल और सांस्कृतिक प्रतियोगिताओं के आयोजन को भी गति दी जाएगी। निजी विश्वविद्यालयों के सामने आने वाली रोजमर्रा की प्रशासनिक दिक्कतों और फाइलों के अटके रहने की समस्या को दूर करने के लिए शासन स्तर पर एक अनूठा ऑनलाइन पोर्टल विकसित किया जाएगा। इस सिंगल-विंडो पोर्टल के माध्यम से विश्वविद्यालय अपनी समस्याएं, जरूरी प्रस्ताव और सुझाव सीधे सरकार तक पहुंचा सकेंगे। इससे दफ्तरों के चक्कर काटने की मजबूरी खत्म होगी और पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता के साथ तेजी आएगी।