उत्तराखंड के सरकारी और अशासकीय विद्यालयों में बुनियादी सुविधाओं और योजनाओं पर लगा ग्रहण

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देहरादून। उत्तराखंड में युवाओं को रोजगार देने और शिक्षा व्यवस्था को सुधारने के सरकार के दावे सरकारी फाइलों और दफ्तरों के चक्करों में फंसकर दम तोड़ रहे हैं। हैरान करने वाला मामला उस प्रदेश से सामने आया है जिसे दुनिया 'योग भूमि' के नाम से जानती है। प्रदेश में मंत्रिमंडल (कैबिनेट) की हरी झंडी और शासनादेश जारी होने के बावजूद सैकड़ों योग प्रशिक्षित बेरोजगार युवा आज भी सरकारी स्कूलों में अपनी तैनाती का इंतजार कर रहे हैं। हद तो यह है कि अब शिक्षा निदेशालय ने यह कहकर हाथ खड़े कर दिए हैं कि हर स्कूल में योग प्रशिक्षक की व्यवस्था करना संभव नहीं है।

पूरा मामला नौकरशाही की सुस्ती और नीतिगत उलझनों का जीवंत उदाहरण है। तत्कालीन मुख्यमंत्री की घोषणा के बाद 31 दिसंबर 2021 को कैबिनेट ने इस प्रस्ताव को मंजूरी दी थी। इसके बाद लंबे इंतजार के बाद 22 फरवरी 2025 को इसका शासनादेश जारी हुआ और 28 फरवरी 2025 को पदों की स्वीकृति दी गई, लेकिन चौंकाने वाली बात यह है कि यह स्वीकृति मात्र छह दिन के लिए ही मान्य थी। बाद में 11 अप्रैल 2025 को एक अन्य संशोधित आदेश जारी किया गया। सरकार ने वादा किया था कि हर जिले के कम से कम एक स्कूल में योग प्रशिक्षक की तैनाती की जाएगी, लेकिन आज तक एक भी बेरोजगार को नियुक्ति पत्र नहीं मिल सका है। निदेशालय का अजीब तर्क: अब शिक्षा निदेशालय एक नया रास्ता तलाश रहा है। निदेशालय का सुझाव है कि स्कूलों में पहले से तैनात व्यायाम शिक्षकों को ही दूरस्थ शिक्षा के माध्यम से योग में डिप्लोमा या डिग्री कोर्स करने के लिए प्रेरित किया जाए, ताकि अलग से भर्ती न करनी पड़े। इस लचर व्यवस्था को लेकर योग प्रशिक्षितों में भारी आक्रोश है। शिक्षा विभाग के अधिकारी अपनी जिम्मेदारी एक-दूसरे पर टालने में लगे हैं। योग शिक्षक संगठन के प्रदेश अध्यक्ष अमित नेगी का कहना है कि, "युवाओं को स्कूलों में तैनाती देने के बजाय शिक्षा निदेशालय उन्हें मुख्य शिक्षा अधिकारी कार्यालय भेजता है और सीईओ कार्यालय वापस निदेशालय का रास्ता दिखा देता है। यह प्रदेश के पढ़े-लिखे बेरोजगारों के साथ एक भद्दा मजाक है। विभागीय सुस्ती की मार सिर्फ बेरोजगारों पर ही नहीं, बल्कि सरकारी और अशासकीय स्कूलों में पढ़ने वाले गरीब बच्चों पर भी पड़ रही है। अप्रैल 2025 की कैबिनेट बैठक में प्रदेश के कक्षा 1 से 12वीं तक के लगभग 10 लाख छात्र-छात्राओं को मुफ्त नोटबुक्स (कॉपियां) देने के प्रस्ताव को मंजूरी दी गई थी। नया सत्र शुरू होने के बाद भी बच्चे कॉपियों का इंतजार ही करते रह गए और उन्हें बाजार से महंगी कॉपियां खरीदने पर मजबूर होना पड़ा। इस पूरे विवाद पर माध्यमिक शिक्षा निदेशक डॉ. मुकुल सती ने सफाई पेश की है। उन्होंने कहा कि योग प्रशिक्षितों के मामले में सभी जिलों के मुख्य शिक्षा अधिकारियों को आवश्यक दिशा-निर्देश जारी कर दिए गए हैं। स्कूलों में व्यावहारिक तैनाती का काम सीईओ के स्तर से ही पूरा किया जाना है। वहीं, बच्चों को मुफ्त कॉपियां न मिलने के सवाल पर उन्होंने आश्वासन दिया कि इस तकनीकी बाधा को जल्द दूर कर बच्चों को कॉपियां उपलब्ध करा दी जाएंगी। अब देखना यह है कि फाइलों से निकलकर यह योजनाएं धरातल पर कब तक उतर पाती हैं।