ग्लेशियरों के पिघलने की गति बढ़ सकती है, वनाग्नि से उत्पन्न कार्बन हिमालय के लिए बना खतरा

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उत्तराखंड के जंगलों में इस साल वनाग्नि ने समय से पहले ही विकराल रूप धारण कर लिया है। विशेषकर गढ़वाल मंडल के जंगलों के लिए अप्रैल का महीना 'अग्निपरीक्षा' साबित हुआ। महीने के तीसरे सप्ताह तक आग की घटनाओं ने पिछले कई सालों के आंकड़ों को पीछे छोड़ दिया है। हालाँकि, पिछले 24 घंटों में प्रदेश के कई हिस्सों में हुई बारिश ने धधकते जंगलों को कुछ राहत जरूर दी है, लेकिन वन विभाग इसे केवल एक 'अस्थायी ब्रेक' मान रहा है।

उत्तराखंड के गढ़वाल मंडल में इस साल वनाग्नि ने समय से पहले ही विकराल रूप धारण कर लिया है। अप्रैल के तीसरे सप्ताह तक ही आग की घटनाओं ने पिछले वर्षों के रिकॉर्ड तोड़ दिए, जिससे जंगलों और पर्यावरण पर गंभीर खतरा मंडराने लगा है। वन विभाग के आंकड़ों के मुताबिक अब तक 145 से अधिक वनाग्नि की घटनाएं दर्ज की जा चुकी हैं, जिनमें करीब 96.08 हेक्टेयर जंगल जलकर खाक हो चुके हैं। इस बार स्थिति और चिंताजनक इसलिए भी है क्योंकि पिछले साल की तुलना में लगभग 40 प्रतिशत अधिक वन क्षेत्र प्रभावित हुआ है। विशेषज्ञों का मानना है कि बढ़ते तापमान, नमी की कमी और मानवीय लापरवाही इस संकट को और गहरा बना रही है। जंगलों में जमा सूखी पत्तियां और तेज गर्मी आग को तेजी से फैलाने में अहम भूमिका निभा रही हैं। गढ़वाल मंडल इस समय वनाग्नि का सबसे बड़ा केंद्र बना हुआ है। अप्रैल के तीसरे सप्ताह तक यहां 100 से अधिक घटनाएं सामने आ चुकी हैं। बदरीनाथ वन प्रभाग में सबसे अधिक 41 घटनाएं दर्ज की गई हैं, जहां करीब 65 हेक्टेयर जंगल प्रभावित हुए हैं। वहीं रुद्रप्रयाग वन प्रभाग में 30 घटनाएं सामने आईं, जिनमें 10 आरक्षित और 20 सिविल वन क्षेत्र शामिल हैं।

वन विभाग के अनुसार, कुल 145 घटनाओं में से 81 आरक्षित वनों और 64 सिविल वनों में आग लगी है। यह स्थिति न केवल जंगलों की हरियाली के लिए खतरा है, बल्कि स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र पर भी गंभीर असर डाल रही है। वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास नष्ट हो रहे हैं, जिससे वे मजबूर होकर आबादी वाले क्षेत्रों की ओर रुख कर रहे हैं। वनाग्नि का प्रभाव अब केवल जंगलों तक सीमित नहीं रहा है, बल्कि इसका असर वायु गुणवत्ता पर भी स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है। पहाड़ों की स्वच्छ हवा अब धुएं और प्रदूषण से प्रभावित हो रही है। कई क्षेत्रों में वायु गुणवत्ता सूचकांक चिंताजनक स्तर तक पहुंच गया है। आग से निकलने वाला धुआं और ब्लैक कार्बन वातावरण में मिलकर तापमान को और बढ़ा रहे हैं, जिससे गर्मी का असर और तेज हो रहा है। इससे सांस संबंधी बीमारियों का खतरा भी बढ़ गया है। वैज्ञानिकों के अनुसार, ब्लैक कार्बन का प्रभाव हिमालयी ग्लेशियरों पर भी पड़ सकता है, जिससे बर्फ के तेजी से पिघलने का खतरा बढ़ जाता है। यदि समय रहते इस समस्या पर नियंत्रण नहीं किया गया, तो भविष्य में इसके और गंभीर परिणाम सामने आ सकते हैं। हालांकि, इस बीच प्रदेश के कई हिस्सों में हुई बारिश ने फिलहाल कुछ राहत जरूर दी है। हल्की से मध्यम बारिश के कारण आग के फैलाव में कमी आई है और तापमान में गिरावट दर्ज की गई है। मौसम विभाग के अनुसार आने वाले कुछ दिनों तक रुक-रुक कर बारिश जारी रह सकती है, जिससे स्थिति को नियंत्रित करने में मदद मिलेगी। फिर भी, विशेषज्ञ इसे अस्थायी राहत मान रहे हैं। जैसे ही मौसम दोबारा शुष्क होगा, वनाग्नि की घटनाएं फिर बढ़ सकती हैं। इसको देखते हुए वन विभाग और प्रशासन हाई अलर्ट पर हैं। सीसीएफ वन अग्नि सुशांत पटनायक ने बताया कि इस वर्ष तापमान में तेजी से वृद्धि और लंबे समय तक शुष्क मौसम रहने के कारण वनाग्नि की घटनाओं में इजाफा हुआ है। उन्होंने कहा कि विभाग लगातार निगरानी कर रहा है और संवेदनशील क्षेत्रों में विशेष टीमें तैनात की गई हैं। उन्होंने लोगों से अपील की है कि जंगलों में आग लगने से रोकने में सहयोग करें। कुल मिलाकर,उत्तराखंड के जंगलों पर मंडरा रहा यह खतरा आने वाले समय में और गंभीर रूप ले सकता है, यदि इसे नियंत्रित करने के लिए सामूहिक प्रयास नहीं किए गए।